~ मेरी डोर तेरे हाथ में ~

~मेरी डोर तेरे हाथ में ~

कटी पतंग थी मैं…. जिसे लूटना तो सब चाहते थे…. पर मुझ तक पहुँच कोई नही पाया….

पर तुम अलग थे…तुम बीच की सारी दीवार लाँघ आ पहुँचे मुझ तक….ऊँच नीच की परवाह किये बगैर आ गये मुझ तक….मुझे उठाया सम्भाल और बांध लिये फिर मुझे अपने मजबूत डोर से..जख्मों को सहलाये मरहम पट्टी किये….और फिर दिये मुझे एक नया आसमां उड़ने के लिये..लड़खड़ायी मैं……लोगों ने चाहा एक बार फिर काटना मुझे…. पर तुम गिरने न दिये मुझे….मजबूती से पकड़े रहे उस डोर को जिससे बांधा था इक रोज तुमने मुझे….

हवाओं के रुख बदले पर तुम न बदले….हाँ थोड़ी ढील दिये… आसमां में उड़ते और भी रंग बिरंगी पतंगों संग पेंच लड़ाये….पर बस कुछ पल के लिये…..क्यूँकि मोह तो तुम्हे इस कटी पतंग से ही है….. मैं फिर लड़खड़ायी गिरते गिरते बची….क्यूँकी इक बार फिर डोर सम्भाल लिये तुम….तुम मुझे बचाने के लिये औरों दांव पेंच लड़ाये…. पर मुझे महफूज रख एक खुला आसमां दिये उड़ने के लिए…..

और यकीन है मुझे तुम गिरने न दोगे, लूटने न दोगे मुझे…क्यूँकी “मेरी डोर तुम्हारे हाथ” में है….💕

देखना तुम चाँद को

~देखना तुम चाँद को~

सुनो…

मैं ये नही कहती चाँद से तुम्हारा ज़िक्र करूँगी या औरो की तरह मैं तुम्हे चाँद में देखती हूँ…

मै नही करती ऐसा क्यूँकि तुम रहते हो मेरे पास मुझ में ही कहीं….
मेरी बातों में मेरी हंसी में तो कभी मेरे आँसु में…
प्यार के उस पहले स्पर्श में तो कभी खुशबु लिये सांसो में…

मैं तुम्हे महसूस करती हूँ रात के उस पहर में जब नीद न आने पर तुम मुझे खींच कर अपने पास सीने पर सुलाते हो और तब मैं सुनती हूँ एक संगीत तुम्हारे धड़कनों की और बजते हैं मद्धम सितार हमारे सांसों के…..

मैं जी उठती हूँ उस पल को,,,, मैं महसूस करती हूँ जब तुम्हारे सख्त हाथ मेरे सर पर किसी मोर पंख की तरह सहलाते हैं और किसी बच्चे की तरह छुप जाती हूँ मैं तुम में….

मैं महसूस करती हूँ तुम्हे जब सुबह के उस एक कप चाय को दो कप करती हूँ…

पर डरती हुँ जब होगी अमावस्य की स्याह रात तब सिवाय घुप अँधेरे के कुछ न होगा… हाँ तुम भी नही होगे पास मेरे….पर महसूस करूँगी फिर भी मैं तुम्हे…..

पर सुनो तुम देखना उस पूर्णमासी के चाँद को मेरे चले जाने के बाद…..

मैं ये भी जानती हुँ शायद मेरे चले जाने से तुम्हे कोई फर्क न पड़े फिर भी मैं चाहती हूँ…

जब मैं नही रहूँगी तब तुम देखना अपने शहर से इस चाँद को और मैं मेरे शहर से क्यूँकि यही एक सामान्य होगा हमारे बीच….

एक बार फिर इसकी रौशनी में नहायेंगी हमारी यादें… मैं चुप रहूँगी चाँद के आगे पर तुम सुनना मेरी हर अनकही बातें…

मैं नही हटाऊंगी अपने गाल से वो बिखरे बाल तुम धीरे से हटा कर देखना मुझे निग़ाहें ज़ार ज़ार…

बन्द आँखें जब भीगेंगीं पलके तब चूम लेना उन आंसुओं को अपने होंठों से…..

लड़खड़ायें जब मेरे पाँव तब थाम लेना मुझको तुम और देना सहारा अपने बाँहों का…..

कल्पनाओं में ही सही पर महसूस करूँगी तुमको बस तुम देखना आपने शहर से चाँद को जब तक मैं देखुँ मेरे शहर से…

हाँ पर डरती हूँ अमावस्या की स्याह रात से जब ये चाँद भी न होगा और तुम भी न होगे…

पर महसूस करूँगी फिर भी मैं तुम्हे…..

याद आयेगी तब हम दोनों की वो रात भर के झगड़े और प्यार की बातें….और शाम की वो दो खाली चाय के कप…

वो घाट पर घण्टों बैठ चाय के साथ करना इधर उधर की बातें और सोचना अपने आने वाला कल….

वो कहना तुम्हारा देखो चाँद को और देखना मेरा तुमको….वो राह चलते मेरा हाथ थाम लेना…

वो कैद होना कभी तुम्हारे बाँहों में, तो कभी तुम्हारे कैमरे के फ्रेम में….

मैं न रहूँगी ये चाँद भी न होगा हमेशा पर याद आयेंगे ये सारे किस्से हमारे…

देखना तुम अपने शहर से चाँदनी रातें और मैं मेरे शहर से…

तुम्हारी…….

💕